27 Mar 2026, Fri

दिन में एक बार भी पीने से बढ़ता है मुंह के कैंसर का खतरा, ‘कोई सुरक्षित सीमा नहीं’: अध्ययन


एक अध्ययन के अनुसार, जब शराब और मुंह के कैंसर के बीच संबंध की बात आती है तो इसकी कोई सुरक्षित सीमा नहीं है क्योंकि दिन में एक बार भी शराब पीने से जोखिम 50 प्रतिशत बढ़ सकता है।

टाटा मेमोरियल सेंटर, मुंबई द्वारा किए गए अध्ययन में कहा गया है कि सभी प्रकार की शराब, चाहे वह बीयर, व्हिस्की, वाइन या स्थानीय रूप से उत्पादित शराब जैसे महुआ, ताड़ी, देशी शराब या ठर्रा हो, मुख गुहा कैंसर के खतरे को बढ़ाती है।

ओपन एक्सेस जर्नल बीएमजे ग्लोबल हेल्थ में ऑनलाइन प्रकाशित शोध रिपोर्ट में कहा गया है कि, हालांकि, सबसे बड़ा जोखिम स्थानीय रूप से बनी शराब से जुड़ा है।

इसमें कहा गया है, “मौखिक कैंसर के विकास में शराब पीने की कोई सुरक्षित सीमा नहीं है। यहां तक ​​कि शराब का कम दैनिक सेवन, केवल एक मानक पेय के आसपास, भारत में मुंह (बुक्कल म्यूकोसा) कैंसर के 50 प्रतिशत बढ़ते जोखिम से जुड़ा हुआ है।”

अध्ययन में पहली बार यह भी पुष्टि हुई कि तंबाकू चबाने और शराब पीने से संयुक्त रूप से मौखिक गुहा के कैंसर का खतरा बढ़ जाता है। दोनों आदतों के अभाव की तुलना में जोखिम चार गुना अधिक है।

“चाहे कितने भी लंबे समय तक तंबाकू का उपयोग किया गया हो, मुंह के कैंसर के खतरे को बढ़ाने में अल्कोहल एक सहायक कारक था, संभवतः इसलिए क्योंकि इथेनॉल मुंह की आंतरिक परत की वसा सामग्री को बदल सकता है, जिससे इसकी पारगम्यता बढ़ जाती है और इसलिए चबाने वाले तंबाकू उत्पादों में अन्य संभावित कार्सिनोजेन्स के प्रति इसकी संवेदनशीलता बढ़ जाती है।

अध्ययन में कहा गया है, “चूंकि तंबाकू का उपयोग और शराब पीना अक्सर साथ-साथ चलते हैं, इसलिए मौखिक गुहा के कैंसर को रोकने के लिए तंबाकू के साथ-साथ शराब के उपयोग को नियंत्रित करना जरूरी है।”

शोधकर्ताओं ने बताया कि मुंह का कैंसर भारत में दूसरी सबसे आम बीमारी है, जिसके अनुमानित 1,43,759 नए मामले और हर साल 79,979 मौतें होती हैं। इस बीमारी की दर लगातार बढ़ी है, प्रत्येक 1,00,000 भारतीय पुरुषों पर इसकी घटना दर लगभग 15 है।

भारत में मुँह के कैंसर का मुख्य रूप गालों और होंठों की मुलायम गुलाबी परत (बुक्कल म्यूकोसा) है। रिपोर्ट में कहा गया है कि प्रभावित लोगों में से आधे से भी कम (43 प्रतिशत) पांच या अधिक वर्षों तक जीवित रह पाते हैं।

अध्ययन में 2010 और 2021 के बीच पुष्टि किए गए बुक्कल म्यूकोसा कैंसर वाले 1,803 लोगों और बीमारी से मुक्त 1,903 यादृच्छिक रूप से चयनित लोगों (नियंत्रण समूह) की तुलना की गई।

उन लोगों की तुलना में जो शराब नहीं पीते थे, उनमें जोखिम 68 प्रतिशत अधिक था। यह देखा गया कि किसी भी प्रकार के अल्कोहल वाले पेय से खतरा बढ़ जाता है। अध्ययन में कहा गया है कि अंतरराष्ट्रीय और स्थानीय स्तर पर उत्पादित दोनों तरह की शराब से बुक्कल म्यूकोसा कैंसर होने का खतरा लगभग दोगुना हो जाता है।

टाटा मेमोरियल सेंटर के निदेशक डॉ. सुदीप गुप्ता ने कहा कि अध्ययन पहली बार शराब और तंबाकू चबाने के संयुक्त प्रभाव को दर्शाता है।

एसीटीआरईसी के निदेशक डॉ. पंकज चतुर्वेदी ने सुझाव दिया कि अब समय आ गया है कि अधिकारियों को शराब नियंत्रण नीतियों को मजबूत करना चाहिए।

चतुवेर्दी ने कहा कि स्थानीय स्तर पर बनी शराब का बाजार ज्यादातर अनियमित है, प्रतिभागियों द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले कुछ रूपों में 90 प्रतिशत तक अल्कोहल की मात्रा होती है।

सेंटर फॉर कैंसर एपिडेमियोलॉजी के निदेशक डॉ. राजेश दीक्षित ने बताया कि अध्ययन के अनुसार, भारत में सभी बुक्कल म्यूकोसा कैंसर के 10 में से 1 से अधिक मामले (लगभग 11.5 प्रतिशत) शराब के कारण होते हैं, जो कि अरुणाचल प्रदेश, मेघालय, असम, तेलंगाना और मध्य प्रदेश जैसे बीमारी के उच्च प्रसार वाले कुछ राज्यों में बढ़कर 15 प्रतिशत से अधिक हो गया है।

दीक्षित ने कहा कि गुजरात जैसे राज्यों ने शराब की बिक्री पर प्रतिबंध लगा दिया है, जहां शराब से संबंधित मौखिक कैंसर का जोखिम बहुत कम है।

वैज्ञानिक अधिकारी और अध्ययन के प्रमुख वरिष्ठ लेखक डॉ. शरयु म्हात्रे ने कहा कि इससे पता चलता है कि बुक्कल म्यूकोसा कैंसर के खतरे के लिए शराब के सेवन की कोई सुरक्षित सीमा नहीं है।

म्हात्रे ने कहा, “हमारे निष्कर्ष बताते हैं कि शराब और तंबाकू के उपयोग की रोकथाम के लिए सार्वजनिक स्वास्थ्य कार्रवाई से भारत से बक्कल म्यूकोसा कैंसर को काफी हद तक खत्म किया जा सकता है।”



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